संघर्ष की राह पर झारखंड! जल-जंगल-जमीन बचाने को उठा बड़ा कदम
संघर्ष की राह पर झारखंड! जल-जंगल-जमीन बचाने को उठा बड़ा कदम
संघर्ष की राह पर झारखंड! जल-जंगल-जमीन बचाने को उठा बड़ा कदम

- झारखंड जनाधिकार महासभा सामाजिक कार्यकर्ताओं और जन संगठनों का एक साझा मंच है, जो राज्य में आदिवासी, दलित, किसान, मजदूर, महिला और वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए लगातार काम करता रहा है। महासभा जन अधिकारों और लोकतंत्र पर हो रहे हमलों के खिलाफ आवाज उठाती है और लोगों को संगठित कर जन मुद्दों को सामने लाने का प्रयास करती है। संगठन के अंतर्गत कोर समिति, संयोजन दल तथा अलग-अलग मुद्दों पर आधारित कार्यदल काम करते हैं।
झारखंड जनाधिकार महासभा का उद्देश्य हिंदुत्व के सांस्कृतिक हमलों के विरुद्ध झारखंडियत के मूल मूल्यों को मजबूत करना भी है; इसी सोच के तहत पहला सम्मेलन 2021 में जयपाल सिंह मुंडा के गांव में आयोजित हुआ था| इस कड़ी में दूसरा राज्य सम्मेलन 13–14 अप्रैल 2026 को लुगू बुरु घंटाबाड़ी धोरोम गढ़, ललपनिया (गोमिया, बोकारो) में आयोजित हो रहा है। महासभा सामाजिक कार्यकर्ताओं और जन संगठनों का एक साझा मंच है, जो राज्य में आदिवासी, दलित, किसान, मजदूर, महिला और वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रही है। सम्मेलन की शुरुआत तिलका मांझी, सिद्धू-कान्हू, बिरसा मुंडा, फूलो-झानो, जयपाल सिंह मुण्डा, स्टेन स्वामी सहित अनेक ऐतिहासिक जननायकों को ‘हूल जोहार’ देकर की गई। दिनेश मुर्मू ने लुगू बुरु के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह स्थल आदिवासी समाज की सामूहिक सोच और निर्णय का परिणाम है, जहां बाहरी हस्तक्षेप और कब्ज़े से बचाने के लिए मंदिर निर्माण नहीं होने दिया गया ताकि यह केवल आदिवासी-সংथाली पूजा स्थल बना रहे। समिति अध्यक्ष बाबली सोरेन ने कहा कि बिना किसी लिखित संविधान के भी यहां के लोग सदियों से अपनी परंपरा, भाषा और संस्कृति को बचाते आए हैं। उन्होंने बताया कि इस स्थल पर देश-विदेश से लोग आते हैं और सभी से आगामी जनगणना में सरना धर्म कोड की मांग करने की अपील की।
सम्मेलन के प्रारंभिक सत्र में विनोद सिंह, ज्यां द्रेज, दयामनी बरला, नीतिशा खलखो और मनोज भुइयां सहित कई वक्ताओं ने वर्तमान हालात पर अपने विचार रखे। विनोद सिंह, झारखंड विधानसभा के पूर्व सदस्य ने कहा कि देश में आदिवासियों और आंदोलनकारियों को झूठे मामलों में फंसाकर दमन किया जा रहा है. नॉएडा में मजदूरों पर लाठीचार्ज हो रहा है और लोगों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक न्यायपूर्ण और बराबरी पर आधारित समाज बनाने के लिए आर्थिक समानता बेहद जरूरी है।अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने लोकतंत्र को केवल चुनाव तक सीमित न मानते हुए इसके व्यापक अर्थ पर जोर दिया और बढ़ती असमानता तथा कॉरपोरेट नियंत्रण पर सवाल उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी सदियों से लोकतांत्रिक रहे हैं और उन्होंने अपनी जमीन, अधिकार और आज़ादी के लिए लगातार संघर्ष किया है।
प्रमुख आदिवासी कार्यकर्ता दयामनी बरला ने झारखंड में बढ़ते विस्थापन और कॉरपोरेट कब्ज़े पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भूमि बैंक के जरिए अडानी-अंबानी जैसे कॉरपोरेट घरानों को जमीन देने का काम किया जा रहा है और ग्रामसभा के अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने पूरे झारखंड के लोगों से CNT/SPT, पांचवीं अनुसूची और वन अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट संघर्ष करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हालात बहुत गंभीर हैं, इसलिए चुप रहने के बजाय अपनी बात मजबूती से रखना जरूरी है। साथ ही उन्होंने मनरेगा को बहाल करने और जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए संघर्ष तेज करने की बात कही।पलामू से आए युवा कार्यकर्ता मनोज भुइयां ने कहा कि आज राज्य में दलित और आदिवासी समुदाय आर्थिक और मानसिक शोषण के शिकार हैं, जबकि अनुसूचित जाति आयोग का गठन अब तक नहीं हुआ और छात्रों को छात्रवृत्ति भी नहीं मिल रही है।
नीतिशा खलखो ने कहा कि आज शिक्षा संस्थानों में नई शिक्षा नीति के माध्यम से मनुवादी सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पाठ्यक्रम के जरिए उपनिषद, रामायण और मनुस्मृति जैसे ग्रंथों को बढ़ावा देकर आदिवासी इतिहास और संस्कृति को हाशिये पर धकेला जा रहा है, जबकि संथाली, कुरुख, हो जैसी क्षेत्रीय भाषाओं के अस्तित्व को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने मीडिया और फिल्मों के माध्यम से फैलाए जा रहे प्रचार और आदिवासी सांस्कृतिक स्वरूप को बदलने के प्रयासों पर भी चिंता जताई।
सम्मेलन के आगे के सत्रों में विभिन्न क्षेत्रों के संघर्षशील साथियों और आंदोलन प्रतिनिधियों द्वारा अपने मुद्दे रखे गए। इसके साथ ही प्रवीर पीटर, अम्बिका यादव, संजू, मीणा मुर्मू, रमेश जेराई, अशोक पल आदि वक्ताओं ने भी संबोधित किया| सम्मेलन के माध्यम से जल-जंगल-जमीन, संविधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए व्यापक एकजुटता को मजबूत करने का आह्वान किया गया। इस सम्मेलन में झारखंड के विभिन्न जिलों पश्चिमी सिंहभूम, लातेहार, बोकारो, सरायकेला-खरसावां, खूंटी, पाकुड़, गोड्डा, चतरा, पूर्वी सिंहभूम आदि से अनेक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

