धर्मांतरण के बाद जाति खत्म? झारखंड हाईकोर्ट में बड़ी PIL दायर!
धर्मांतरण के बाद जाति खत्म? झारखंड हाईकोर्ट में बड़ी PIL दायर!
धर्मांतरण के बाद जाति खत्म? झारखंड हाईकोर्ट में बड़ी PIL दायर!

आज दिनांक 16, 5, 2026 स्थान सेक्टर 3 एन टाइप धूमकुड़िया परिसर, धुर्वा
ज्ञात हो भारत के तीन माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्याय निर्णय के आलोक में धर्मांतरित ईसाइयों का जाति प्रमाण पत्र निरस्त करने के लिए माननीय झारखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका पीआई एल दिनांक 14,5,2026 को अधिवक्ता राजीव कुमार एवं नितेश्वरी कुमारी के माध्यम से दाखिल कर दिया गया है जिसमें उदाहरण के तौर पर माननीय कृषि मंत्री झारखंड सरकार श्रीमती शिल्पी नेहा तिर्की होगी। जिसमें उन्होंने अपने शपथ पत्र में जाति उरांव और धर्म ईसाई दर्ज है ।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय का जजमेंट सी सेल्वा रानी बनाम विशेष सचिव सह जिला कलेक्टर एवं अन्य 2024 में स्पष्ट कहा है कि ईसाई धर्म किसी भी जाती वर्गीकरण को मान्यता नहीं देता है। सभी ईसाइयों को समान माना जाता है और एक ईसाई और दूसरे प्रकार के ईसाई के बीच कोई अंतर नहीं है। ईसाई धर्म न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में प्रचलित है और ईसाई धर्म कहीं भी जाती विभाजन को मान्यता नहीं देता है ईसाई धर्म के सिद्धांत ईसाई धर्म को मानने वाले व्यक्तियों को जाति व्यवस्था जैसे किसी भी वर्गीकरण के आधार पर विभाजित या भेदभाव किए जाने के खिलाफ है । सामान्य नियम यह है कि धर्मांतरण जाति से निष्कासन के रूप में कार्य करता है दूसरे शब्दों में धर्म परिवर्तन करने वाले की कोई जाति नहीं रह जाती है। जिसमें पॉइंट 16 और 17 में स्पष्ट उल्लेख है। दूसरा इसी तरह के0 पी0 मन्नू बनाम अध्यक्ष जांच समिति समुदायिक प्रमाण पत्र की सत्यापन 2015 पॉइंट नंबर 9,14 और 41मे उल्लेख है। तीसरा चिंतादा आनंद 24 मार्च 2026 पॉइंट नंबर 31, 39 और 55 मे उल्लेख किया है कि जाति व्यवस्था ईसाइयों में नहीं होता है ना ही इनके ऊपर एससी, एसटी एक्ट लागू होता है केवल उन व्यक्तियों पर लागू होता है जो हिंदू अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्य है । मूलभूत ईसाई धर्म ग्रंथ द न्यू टेस्टामेंट कहता है की ईसाई धर्म अपने मूल धार्मिक नींव से ही जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं देता या उसमें समाहित नहीं करता। ईसाई धर्म में ना तो कोई यहूदी है और न हीं गैर यहूदी ना कोई दास है और न ही कोई स्वतंत्र न ही कोई पुरुष है और न ही कोई स्त्री क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो अर्थात ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था भेदभाव उच्च नीचे नहीं है सब बराबर हैं। तो सवाल उठता है कि जिसका जाती ही नहीं है तो उनका जाति प्रमाण पत्र किस किस आधार पर निर्गत हुआ है या हो रहा है? जाति व्यवस्था केवल हिंदुओं और आदिवासी/ जनजाति मे है।
उपरोक्त माननीय उच्चतम न्यायालय के न्याय निर्णय के आलोक में जितने भी धर्म परिवर्तित ईसाइयों का जाति प्रमाण पत्र निरस्त हो यही मांग माननीय झारखंड उच्च न्यायालय मे जनहित याचिका दाखिल किया गया जिसको माननीय झारखंड उच्च न्यायालय ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है ।
इससे पहले राज्य के मुख्य सचिव ,कार्मिक सचिव, उपयुक्त रांची, अंचलाधिकारी रातु को आवेदन देकर श्रीमती शिल्पी नेहा तिर्की का निर्गत जाति प्रमाण पत्र निरस्त करने की मांग की गई थी लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अंत में मुझे आदिवासी /जनजातियों का हक अधिकार और धर्म की रक्षा के लिए माननीय झारखंड उच्च न्यायालय के शरण में जाना पड़ा।
इस प्रेस वार्ता में संदीप उरांव , सोमा उरांव, विनोद कच्छप, जगन्नाथ भगत, जय मंत्री उरांव, सुशीला उरांव, लुथरु उरांव, राजू उरांव, सुनील उरांव, मंगल उरांव एवं अन्य शामिल थे।
भवदीय
मेघा उरांव

